कर्नाटक ह‍िजाब मामला: सुप्रीम कोर्ट में SG का दलील, कुरान में सिर्फ हिजाब का उल्लेख होने से वो अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं

कर्नाटक ह‍िजाब मामला: सुप्रीम कोर्ट में SG का दलील, कुरान में सिर्फ हिजाब का उल्लेख होने से वो अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं


हाइलाइट्स

याचिकाकर्ताओं द्वारा इस बात का कोई दावा नहीं किया गया था कि यह प्रथा धर्म के साथ ही शुरू हुई थी.
एसजी ने पुलिस बलों में दाढ़ी रखने या फिर बाल बढ़ाने पर प्रतिबंध के संबंध में एक अमेरिकी कोर्ट के फैसले को जिक्र किया.

कर्नाटक ह‍िजाब मामले की मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्‍य सरकार की तरफ से सॉल‍िस‍िटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलील दी याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक परम्परा है. कई इस्लामिक देश में महिलाएं हिजाब के खिलाफ लड़ रही है मसलन ईरान में. इसलिए हिजाब कोई अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं है. कुरान में सिर्फ हिजाब का उल्लेख होने मात्र से वो इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक परम्परा नहीं हो जाती. मेहता ने दलील दी क‍ि वेदशाला और पाठशाला दोनों अलग हैं. अगर हम सेक्युलर इंस्टिट्यूट्स चुनते है, तो हमें नियमों का पालन करना होगा.

एसजी तुषार मेहता की सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

1- एसजी ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा क‍ि इन फैसलों का उल्लेख उनके द्वारा 2020 में लिखे गए एक लेख में किया गया है. जब वीसी की सुनवाई में कैजुअल ड्रेस में वकीलों के पेश होने के मामले सामने आए थे. उन्‍होंने कहा क‍ि खाली समय में उन्होंने इस मुद्दे पर कानून पर शोध किया और जानकारी मिली. एक अमेरिकी फैसले का जिक्र करते हुए कहते है क‍ि एक वकील टोपी पहनकर अदालत में यह कहते हुए आता है कि यह ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म का हिस्सा है, जज आपत्ति करता है. इस तरह के एक विनियमित मंच में कोर्ट द्वारा आयोजित प्रतिबंध को बरकरार रखा जाएगा यदि यह उचित है.

2- ड्रेस का उद्देश्य क्या है? किसी को इस तरह सोचकर ड्रेस नहीं पहननी चाहिए कि मैं हीन महसूस करता हूं. ड्रेस एकरूपता और समानता के लिए है. जब आप उस सीमा को पार करना चाहते हैं, तो आपका परीक्षण भी उच्च सीमा पर होता है.

3- याचिकाकर्ताओं द्वारा कोई दावा नहीं किया गया है कि हिजाब पहनना अनादि काल से एक प्रथा है, क्या यह इतना महत्वपूर्ण है कि अगर इसे नहीं पहना जाता है तो उन्हें धर्म से बाहर कर दिया जाएगा?

4- याचिकाकर्ताओं द्वारा इस बात का कोई दावा नहीं किया गया था कि यह प्रथा धर्म के साथ ही शुरू हुई थी. अभ्यास को धर्म के साथ सह-अस्तित्व के रूप में दिखाया जाना चाहिए.

5- SG मेहता ने कहा कि धार्मिक परंपरा या प्रैक्टिस पचास साल या पच्चीस साल से जारी रहे वो नहीं है. रिलीजियस प्रैक्टिस वो होती है जो धर्म के शुरुआत से ही चल रही हो. वो अभिन्न हिस्सा होती है. अब देखिए तांडव नृत्य तो सनातन धर्म की प्राचीन अवधारणा है लेकिन कोई कहे कि सड़क पर तांडव करते हुए चलना हमारी धार्मिक परंपरा है ये कहना सही नहीं है.

6- अभ्यास इतना आवश्यक होना चाहिए, जैसे सिख काड़ा, पगड़ी आदि के मामले में. आप दुनिया के किसी भी हिस्से में उनके बिना एक सिख के बारे में नहीं सोच सकते.

7- एसजी मेहता ने आदेश पढ़ा, जहां कोई ड्रेस निर्धारित नहीं है, छात्र ऐसी पोशाक पहनेंगे जो समानता और एकता के विचार के साथ अच्छी तरह से चलती हो. उन्होंने कहा क‍ि किसी विशेष धर्म की कोई पहचान नहीं है. आप केवल एक स्टूडेंट के रूप में जा रहे हैं.

8- मैं अपने तर्कों को संक्षेप में बताऊंगा. वर्दी निर्धारित करने के लिए एक वैधानिक शक्ति है. नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों को निर्देश जारी करने के लिए सरकार में एक वैधानिक शक्ति है. उस शक्ति के प्रयोग का एक अच्छा और उचित औचित्य था.

9- एसजी ने पुलिस बलों में दाढ़ी रखने या फिर बाल बढ़ाने पर प्रतिबंध के संबंध में एक अमेरिकी कोर्ट के फैसले को जिक्र किया. जस्टिस गुप्ता: हमारे पास एक समानांतर निर्णय है, एयरमैन को दाढ़ी रखने की अनुमति नहीं है, लेकिन सशस्त्र बलों में अनुशासन का स्तर छात्रों से अपेक्षित स्तर से भिन्न होता है.

Tags: Hijab controversy, Supreme Court, Tushar mehta



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