दास्तान-गो : नूर जहां, जिनके हुनर का नूर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान दोनों के हिस्से आया

दास्तान-गो : नूर जहां, जिनके हुनर का नूर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान दोनों के हिस्से आया


दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

———–

जनाब, पुराने फिल्मी नग़्मों के शौक़ीन बहुत से लोग होंगे. और उन्होंने अक्सर उनमें ये गाने भी सुने ही होंगे, ‘जवां है मोहब्बत, हसीं है ज़माना, लुटाया है दिल ने, ख़ुशी का ख़ज़ाना’ या ‘आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी ज़वां है’ या फिर ‘आ जा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे, है कौन जो बिगड़ी हुई तक़दीर संवारे’. मगर इस पर ग़ौर शायद कम लोग करते हों कि इन नग़्मों को गाया किसने है. कोई-कोई लोग इन्हें सुरैया का बता देते होंगे और कुछ तो शायद लता मंगेशकर का भी. क्योंकि लता जी पहले-पहल थोड़ा-थोड़ा ऐसे ही अंदाज़ में फिल्मों के लिए गाया करती थीं. हालांकि जानकार लोगों को ऐसे सदाबहार नग़्मे सुनते ही याद आ जाता होगा वह चेहरा, जिसके हुनर का नूर सिर्फ़ हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान के हिस्से में भी भरपूर आया है. नूर जहां, जो साल 1925 में आज ही के रोज यानी सितंबर महीने की 21 तारीख़ को पंजाब के कसूर में पैदा हुई थीं.

वैसे जनाब, आगे बढ़ने से पहले बता देना लाज़िम है कि कहीं-कहीं नूर जहां के जन्म की तारीख़ 23 सितंबर भी लिखी मिलती है और साल 1926. लेकिन इससे भरम में पड़ने की ज़रूरत नहीं. क्योंकि ऐसी ग़फ़लतें पुराने लोगों से जुड़ी तारीख़ों, सालों में हुआ ही करती हैं. इसके बावज़ूद, किसी तरह से पुख़्तगी भी हो ही जाती है. और नूर जहां के मामले में यह पुख़्तगी की है ‘सिटीज़न आर्काइव ऑफ़ पाकिस्तान’ ने. यह पाकिस्तान के कराची और लाहौर से चलने वाला स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) है. कला, संस्कृति के संरक्षण के लिए काम करता है. उसने 2017 में ‘गूगल आर्ट एंड कल्चर’ के लिए एक प्रजेंटेशन जैसा तैयार किया था. उसमें जो तारीख़ लिखी, वह है 21 सितंबर 1925. इसी में ये भी बताया गया है कि नूर जहां की हैसियत पाकिस्तान में यूं थी कि वे ‘मैडम’ कही जाती थीं वहां के ताक़तवर फ़ौजी अफ़सरान भी बड़े अदब से पेश आया करते थे उनसे.

पाकिस्तान ने ‘मैडम नूर जहां’ को ‘मल्लिका-ए-तरन्नुम’ का ख़िताब भी दिया हुआ था. यानी ‘सुरों की रानी’. हालांकि इससे भी काफ़ी पहले हिन्दुस्तान में नूर जहां को ‘पूरब की स्वर-कोकिला’ का दर्ज़ा मिल चुका था. हिन्दुस्तानियों को अंग्रेज बाबू ‘पुरबिया’ कहा करते थे न, उसी हैसियत से. यानी इस हिसाब से हिन्दुस्तान की ‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर से भी पहले अगर किसी को यह दर्ज़ा मिला हुआ था, तो वह नूर जहां थीं. और लता जी तो पहले-पहले इनकी आवाज़ की नक़ल तक किया करती थीं. जिन्हें यक़ीन न आए वे लता जी की शुरुआती फिल्मों जैसे- ‘बाज़ार’, ‘बड़ी बहन’, ‘अनोखा प्यार’, ‘चांदनी रात’ वग़ैरा में उनके गए हुए गाने ख़ुद सुनकर इस बात को पुख़्ता कर सकते हैं. हालांकि बाद में लता जी ने अपनी शैली, अपनी आवाज़ में जो गाना शुरू किया, तो वह तारीख़ में यूं दर्ज़ हुआ कि उसका मेल न अब तक मिला है और न सालों तक मिलने वाला है.

लेकिन जनाब, इन दो महान गायिकाओं का मेल हुआ था. पहली ही बार में, यादग़ार तरीके से. अपने उत्तर प्रदेश के अयोध्या के शाही घराने से त’अल्लुक़ रखने वाले एक जानकार हैं यतींद्र मिश्र. फिल्मों और संगीत के बारे में ख़ूब काम कर रखा है उन्होंने. एक बार बताया था यतींद्र जी ने, ‘बात सन् 1944 की है. उस वक़्त मास्टर विनायक की कंपनी ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ एक फिल्म बना रही थी ‘बड़ी मां’. इस फिल्म के दो गाने कोल्हापुर में फिल्माए जाने थे. उसके लिए नूर जहां कोल्हापुर आई थीं. वे इसमें अदाकारा और गायिका दोनों का किरदार अदा कर रही थीं. पहले ऐसा ही होता था ज़्यादातर. उस वक़्त लता जी भी ‘प्रफुल्ल पिक्चर्स’ में ही काम किया करती थीं. उन्हें जब नूर जहां के आने का इत्तिला मिली तो वे मास्टर विनायक की मदद से उनसे मिलने पहुंच गईं. वहां नूर जहां से मास्टर विनायक ने लता जी का परिचय दिया- ये लता है, अच्छा गाती है’.

जनाब, इस वक़्त तक नूर जहां उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद, बड़े ग़ुलाम अली जैसे आला शास्त्रीय गायकों से संगीत की ता’लीम लेने के बाद ‘ठुमरी की रानी’ जैसी हैसियत भी पा चुकी थीं. यहां ये भी बता दें कि ‘ठुमरी’ हिन्दुस्तानी उप-शास्त्रीय का संगीत एक प्रकार हुआ करता है. तो जनाब, लता जी का जब नूर जहां से मेल हुआ तो जैसा यतींद्र जी बताते हैं, ‘उन्होंने उनसे कुछ सुनाने को कहा. इस पर लता जी ने उन्हें राग जयजयवंती में एक बंदिश सुनाई. अच्छी लगी तो नूर जहां ने उनसे कोई फिल्मी गाना भी सुनाने को कहा. इस पर ‘वापस’ फिल्म का गाना गाया लता जी ने उनके सामने- जीवन है बेकार बिना तुम्हारे. लता जी की गायकी सुनने के बाद नूर जहां ने उन्हें ताक़ीद की और आशीर्वाद भी दिया कि बेटा, ख़ूब रियाज़ किया करो. एक दिन तुम बहुत बड़ी गायिका बनोगी’. और ‘मैडम नूर जहां’ की बात कैसी सोलह आने सच हुई, यह तो दुनिया जानती है.

हालांकि यही नूर जहां हिन्दुस्तान के बंटवारे के वक़्त पाकिस्तान चली गईं और फिर वहीं की होकर रह गईं. वैसे इस बारे में उन्होंने एकबारगी कुछ ‘उज्र (मजबूरी) भी जताया था. साल 1983 की बात है ये. उस वक़्त ‘मैडम नूर जहां’ हिन्दुस्तान आई थीं. तब यूसुफ़ साहब (दिलीप कुमार) ने दूरदर्शन के लिए उनका इंटरव्यू लिया था. दिलीप कुमार, जो हिन्दुस्तान की आज़ादी से ठीक पहले 1947 में आई ‘जुगनू’ फिल्म में बतौर अदाकार नूर जहां के साथ नज़र आए थे. वही दोनों इंटरव्यू के लिए आमने-सामने थे. और दिलचस्प बात ये है कि यह फिल्म ‘मैडम नूर जहां’ के पहले खाविंद (पति, जिससे औरत ने मर्ज़ी से शादी की हो) शौकत हसन रिज़वी ने ही बनाई थी. इनसे ‘मैडम नूर जहां’ ने 1942 में निकाह किया था. यह शादी क़रीब 11 साल चली. दूसरी बार उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मकार एजाज़ दुर्रानी से शादी की, 1959 में. उनके साथ भी रिश्ता 12 साल ही चला.

तो जनाब, उस इंटरव्यू में दिलीप साहब के सामने नूर जहां ने कहा था, ‘बसे हुए घर (हिन्दुस्तान में) को छोड़कर जाने का तो किसी का जी भी नहीं चाहता. मेरे मियां (शौकत हसन) गए, मैं भी चली गई. पर अब यहां मुझे आने की दावत मिली है तो मैंने भी सर-ओ-चश्म क़ुबूल की और मैं आ गई. ये तमन्ना ज़रूर रही, इतने साल, 35 बरस मैंने इस घड़ी का इंतिज़ार किया है. और दुआ मांगती रही कि या अल्लाह! ज़िंदगी में फिर एक बार आप लोगों (हिन्दुस्तान में जान-पहचान वाले) से मिलूं. अपने भाई-बहनों से, दोस्तों से’. अब यहां यह भी बता देते हैं कि हिन्दुस्तान के बंटवारे के वक़्त ‘मैडम नूर जहां’ ने अपने लिए पाकिस्तान को चुना क्योंकि उनकी जन्म-भूमि (कसूर क़स्बा) पाकिस्तान के हिस्से में आई थी, जिसे वे छोड़ना नहीं चाहती थीं. लिहाज़ा, कर्म-भूमि (बंबई) को ख़ुदा हाफ़िज़ कह दिया.

इसके बाद पाकिस्तान जाकर भी ‘मैडम नूर जहां’ ने अपने हुनर से शोहरत के वैसे ही झंडे गाड़े, जिस तरह आज़ादी से पहले हिन्दुस्तान में गाड़े थे. कहते हैं, वहां रेडियो पाकिस्तान पर उनके नग़्मे रोज ही प्रसारित होते थे और इनकी रिकॉर्डिंग नहीं होती थी. वे रेडियो स्टेशन पर जाकर गाती थीं और सीधे प्रसारण कर दिया जाता था. यह सिलसिला कई सालों तक चला. उनकी गायकी और अदाकारी का करियर करीब 60 सालों का रहा. इस दौरान हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी, जैसी ज़बानों में 10,000 से ज़्यादा गाने गाए उन्होंने. दोनों मुल्कों में 50 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया. इनमें क़रीब 35-36 तो हिन्दुस्तान की आज़ादी से पहले ही कर चुकी थीं. फिर पाकिस्तान जाकर वहां पहली महिला फिल्म डायरेक्टर होने का दर्ज़ा भी हासिल किया. इस हैसियत से उन्होंने 1951 में एक पंजाबी फिल्म बनाई थी ‘चन्न वे’. इसमें गायकी, अदाकारी भी उन्हीं की थी. और आख़िर में जिस शान से ज़िंदगी गुज़ारी, उसी शान से दुनिया से रुख़्सती ले ली उन्होंने. दिसंबर महीने की 23 तारीख़, साल 2000 था वह.

Tags: Hindi news, News18 Hindi Originals



Source link