दास्तान-गो: प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा… मैं वो बला हूं, जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूं!

दास्तान-गो: प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा… मैं वो बला हूं, जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूं!


दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, बंबईया सिनेमा में अगर मक़बूल (शोहरत पाया हुआ) खलनायकों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए, तो उसमें एक नाम शुरू के पांच पायदानों में ज़रूर होगा. वह नाम है प्रेम चोपड़ा, जिनके मुंह से निकले डायलॉग आज तक मशहूर हैं. मसलन- ‘सौतन’ (1983) फिल्म का ‘मैं वो बला हूं, जो शीशे से पत्थर का तोड़ता हूं’, या ‘दूल्हे राजा’ (1998) का ‘नंगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या’ या फिर ‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’, जो उन्होंने ‘बॉबी’ (1973) फिल्म में बोला था. उनका ये डायलॉग ‘प्रेम नाम है मेरा…’ तो ऐसा मशहूर हुआ कि इसी शीर्षक से गुजराती और मराठी में दो नाटक बन गए हैं. साल 2010 में मराठी नाटक बना और 2012 में गुजराती. हालांकि गुजराती नाटक के शीर्षक (पापा म्हारा प्रेम चोपड़ा) में थोड़ा सा रद्द-ओ-बदल है. लेकिन 2009 की फिल्म ‘ऑल द बेस्ट : फन बिगिन्स’ में अजय देवगन ने जो डायलॉग बोला, वह बिल्कुल यही था. बल्कि इस फिल्म में तो अजय साहब के किरदार का नाम भी प्रेम चोपड़ा ही रखा गया है.

इतना ही नहीं जनाब. प्रेम चोपड़ा के इस डायलॉग की मशहूरियत इससे भी कहीं ज़्यादा है. वे आज जहां भी जाते हैं, सब उनके मुंह से यह डायलॉग सुनने की ख़्वाहिश किया करते हैं. इसीलिए यूं कहें कि यह आज उनकी पहचान बन चुका है, तो ग़लत नहीं होगा. यही वज़ह है कि जब उनकी बेटी रकिता ने उनकी ज़िंदगी के क़िस्सों, कहानियों, वाक़ि’ओं को समेटने के लिए किताब लिखी तो उसका शीर्षक भी यही दिया, ‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’. साल 2014 में आई यह किताब. इसमें तमाम दिलचस्प जानकारियां हैं. मसलन- जिस डायलॉग के बारे में इतनी देर से बात की जा रही है, वह बोलने के लिए जब प्रेम चोपड़ा साहब को कहा गया तो उन्हें यह बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था. वे इसे बोलने के लिए तैयार नहीं थे. बल्कि ‘बॉबी’ फिल्म में अपने छोटे से किरदार से भी वे बहुत ख़ुश नहीं थे और उसे करने का उनका कोई इरादा नहीं था.

‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’. साल 2014 में आई यह किताब. इसमें तमाम दिलचस्प जानकारियां हैं.

अलबत्ता इसके बावजूद उन्होंने यह किरदार किया और डायलॉग भी बोला क्योंकि उनके सगे साड़ू भाई राज कपूर ने उनसे इसके लिए इसरार (बार-बार कहना) किया था. जी हां जनाब, हिन्दी सिनेमा के मशहूर शो-मैन राज कपूर और प्रेम चोपड़ा साहब की बीवियां कृष्णा और उमा सगी बहनें लगती हैं. शायद यही वज़ह रही कि प्रेम चोपड़ा साहब सिर्फ़ बॉबी में ही नहीं, कपूर ख़ानदान की दूसरी फिल्मों में भी नज़र आते रहे. और उन्होंने इस ख़ानदान की चार पीढ़ियों के साथ काम किया. जैसे- साल 1965 की फिल्म सिकंदर-ए-आज़म में वे पृथ्वीराज कपूर (राज कपूर के वालिद) के बेटे बने थे. वहीं 2009 की फिल्म ‘रॉकेट सिंह : सेल्स ऑफ द इयर’ में रणबीर कपूर (पृथ्वीराज कपूर के पड़पोते) के दादाजी की हैसियत से प्रेम साहब नज़र आए. कपूर-बहुओं में से बबीता के साथ वे ‘डोली’ (1969) में दिखे और नीतू के साथ ‘काला पत्थर’ (1979) में.

जाहिर है, ऐसी तमाम फिल्मों में उनके किरदार हीरो के तो नहीं ही थे. वे या चरित्र-भूमिकाएं रहीं, दादा, मामा, मौसा जैसी या फिर उनकी अपनी मार्के वाली ‘खलनायक’ कीं. लेकिन यह जानकर कोई चौंक सकता है कि प्रेम चोपड़ा साहब फिल्मों में ‘खलनायक’ नहीं, हीरो बनने आए थे. दिखने में अच्छे-खासे रहे. अदाकारी भी बढ़िया. कुछ फिल्मों में बतौर हीरो दिखे भी. जैसे- 1960 की पंजाबी फिल्म ‘चौधरी करनैल सिंह’. बताते हैं, उस फिल्म को देखकर मशहूर फिल्मकार महबूब खान (जिन्होंने ‘मदर इंडिया’ बनाई) ने उन्हें बतौर हीरो अपनी अगली फिल्म में लेने का वादा कर दिया था. लेकिन यह फिल्म बनती कि इससे पहले ही महबूब साहब बीमार पड़ गए. वे इलाज़ कराने हिन्दुस्तान से बाहर चले गए. यह बात है 1962-63 के आस-पास की. उस वक़्त एक और फिल्मकार राज खोसला साहब ‘वो कौन थी’ फिल्म बना रहे थे. ये फिल्म 1964 में आई. इसमें प्रेम साहब बन गए खलनायक.

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प्रेम साहब के मुताबिक, ‘एक बार मैं पिता जी के साथ बगीचे में टहल रहा था. तभी पड़ोस के घर से किसी ने चिल्लाया- अपनी बीवी को छिपा लो, यहां प्रेम चोपड़ा आया है.

प्रेम चोपड़ा साहब ने इस फिल्म में डॉक्टर रमेश का किरदार अदा किया. ज़्यादा बड़ा नहीं था लेकिन जितना था, उसमें भी उन्होंने ऐसी असरदार अदाकारी दिखाई कि देखने वाले बस, देखते ही रह गए. कहते हैं, ‘वो कौन थी’ के प्रीमियर के दौरान महबूब खान साहब को ही चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया गया था. वहां उन्होंने प्रेम साहब से इस बात पर नाराज़गी जताई कि वह उनके लौटने तक इंतिज़ार नहीं कर सके. साथ ही, फिल्म देखकर यह भविष्यवाणी भी कर दी कि अब ‘तू कभी हीरो नहीं बन सकेगा’. और यही हुआ भी फिर. उन्हें आगे की ज़्यादातर फिल्मों में खलनायकों के ही किरदार मिले. और ऐसे मिले कि एक दौर तो यूं भी आया कि हिन्दुस्तान में वे जहां कहीं भी जाते, उन्हें देखने वाले लोग कहने लगते, ‘अपनी बीवियों को छिपा लो, प्रेम चोपड़ा आया है’. ऐसा वाक़ि’आ ख़ुद प्रेम चोपड़ा साहब ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था.

प्रेम साहब के मुताबिक, ‘एक बार मैं पिता जी के साथ बगीचे में टहल रहा था. तभी पड़ोस के घर से किसी ने चिल्लाया- अपनी बीवी को छिपा लो, यहां प्रेम चोपड़ा आया है. इसके बाद मेरे वालिद साहब उनके घर गए. उन्हें समझाया कि उनका बेटा फिल्मों में सिर्फ़ अपना काम करता है. अस्ल ज़िंदगी में वह एक अच्छा इंसान है’. इसी तरह एक और वाक़ि’आ उन्होंने राज्य सभा टीवी के एंकर इरफान को दिए इंटरव्यू में भी बताया, ‘मेरी बेटियां जब थोड़ी बड़ी हुईं तो हम कई दफ़ा उन्हें फिल्में देखने ले जाते थे. शुरू में उन्हें बड़ा अज़ीब लगता कि यार, हमारे फादर इतने लविंग हैं, इतने कॉमेडियन हैं, घर पे. और यहां इतनी गड़बड़ कर रहे हैं. लोगों को तबाह-ओ-बरबाद कर रहे हैं. चक्कर चला रहे हैं. उस वक़्त इंटरवल के दौरान अक्सर मेरी नज़र बच्चियों पर होती थी. वे असमंजस में रहती थीं. पर बाद में उन्हें मैंने समझाया कि यह सब बस, फिल्मों में ही है’.

अलबत्ता जनाब, फिल्मों में आने से पहले अस्ल ज़िंदगी में प्रेम चोपड़ा साहब को सच में बड़े चक्कर चलाने पड़े, फिल्मी दुनिया में पैर जमाने के लिए. बात 1955 के बाद वाले सालों की है. तब पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रेम चोपड़ा साहब बंबई आए ही थे. यहां उन्होंने खर्चा चलाने के लिए ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अख़बार के सर्कुलेशन विभाग में नौकरी कर ली. बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे सूबों में अख़बार के सर्कुलेशन का काम देखने का उन्हें ज़िम्मा मिला. इस चक्कर में महीने के 20-25 दिन बंबई से बाहर रहना पड़ता था. पर बताते हैं कि वे इन दिनों में से भी अपने लिए वक़्त चुरा लेते थे. अक्सर, सर्कुलेशन एजेंटों को रेलवे-स्टेशन पर बुला लिया करते. वहीं उन्हें काम समझाकर, उनसे हालात समझकर उल्टे पैर बंबई लौट आते. ताकि वहां फिल्म बनाने वालों से मेल-मुलाकात कर सकें.

वैसे, शुरुआती दिनों की बात चली है तो ये भी बता दें कि प्रेम चोपड़ा साहब की पैदाइश आज ही की तारीख़ यानी 23 सितंबर को पंजाब के लाहौर शहर में हुई. साल 1935 में. हालांकि हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद इनके वालिद रणबीर लाल चोपड़ा अपनी बीवी रूप रानी और बच्चों- कैलाश, प्रेम और अंजू को लेकर इस तरफ आ गए. शिमला में उन्होंने आशियाना बनाया. लिहाज़ा वहीं प्रेम साहब की शुरुआती पढ़ाई वग़ैरा हुई. फिर पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन किया, वहीं नाटकों में हिस्सा लेते-लेते प्रेम साहब को अदाकारी का शौक लग गया. और जब बंबई आए तो यहां भी पहले नाटक में ही काम किया उन्होंने. वह भी अपने जैसे एक और मक़बूल खलनायक अमरीश पुरी साहब के साथ. अमरीश पुरी तब पृथ्वी थिएटर में काम किया करते थे. बाद में इन दोनों ने क़रीब 20 फिल्मों में एक साथ काम किया. और जहां तक प्रेम साहब की ही बात है तो वे अब तक 60 सालों से ऊपर के अपने करियर में क़रीब 400 फिल्मों में काम कर चुके हैं.

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