Patriarchy: दुनिया में कैसे हुई ‘पितृसत्ता’ की शुरुआत? ईरान से लेकर अफगानिस्तान तक तमाम देश इसमें फंसे, क्या मिल सकता है छुटकारा?


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Highlights

  • ईरान में हिजाब के खिलाफ हुईं महिलाएं
  • अमेरिका में गर्भपात का मांग रहीं अधिकार
  • अफगानिस्तान में घरों में हो गईं कैद

Patriarchy: पितृसत्ता, नारीवाद… ये वो शब्द हैं, जिन्हें हम वैसे तो लंबे वक्त से सुनते आ रहे हैं, लेकिन अभी इनकी चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। ताजा मामला ईरान का है, जहां महिलाएं हिजाब के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। इससे ठीक पहले अफगानिस्तान में महिलाएं अपने शिक्षा और काम करने के अधिकार की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आई थीं। एक झलक हमें सुपर पावर अमेरिका में भी देखने को मिली, जहां महिलाओं ने गर्भपात के अधिकार के लिए सड़कों पर रैलियां निकालीं। इस बीच बहुत से लोग ये मानते हैं कि पितृसत्ता हमेशा से रही है, लेकिन निश्चित रूप से ऐसा नहीं है? इसकी शुरूआत दरअसल कहां से हुई? आज हम इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे। 

पितृसत्ता दुनिया के कुछ हिस्सों में कुछ हद तक कमजोर होने के बाद, एक बार फिर मजबूत हो गई है। अफगानिस्तान में, तालिबान एक बार फिर मजबूत हो गया है, देश में अकाल के हालात हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि महिलाओं को घरों में बंद रहने और सख्त ड्रेस कोड का पालन करने के लिए कहा गया है। और एक अन्य महाद्वीप पर, अमेरिका के कुछ हिस्से यह सुनिश्चित करने के लिए कानून बना रहे हैं कि महिलाओं का अब कानूनन गर्भपात नहीं हो सकता है। दोनों ही मामलों में, राजनीतिक नेतृत्व की विफलता ने दबे हुए पितृसत्तात्मक विचारों को फिर से उभरने का मौका दिया है। इससे हमें पुराने जमाने की तरफ लौटने का एक भयानक एहसास होता है। लेकिन हमारे समाज में पितृसत्ता कब से हावी है?

मानव जाति के विज्ञान में महिलाओं की स्थिति लंबे समय से रुचि का विषय रही है। आम धारणा के विपरीत, शोध से पता चलता है कि पितृसत्ता ‘चीजों का प्राकृतिक क्रम’ नहीं है- यह हमेशा प्रचलित नहीं रहा है और वास्तव में अंततः गायब हो सकता है। पेड़ पौधों और जीव जंतुओं से अपना भोजन जुटाने वाले शिकारी संग्रहकर्ता जैसे प्राचीन समुदाय अपेक्षाकृत समतावादी थे, कम से कम कुछ शासनों की तुलना में जो बाद में आए। और महिला नेता और मातृसत्तात्मक समाज हमेशा मौजूद रहे हैं।

पुरुष संपत्ति

प्रजनन विकास का आधार है। लेकिन यह केवल हमारे शरीर और दिमाग का ही विकास नहीं है- यह हमारे व्यवहार और हमारी संस्कृतियों के विकास से भी जुड़ा है। उदाहरण के लिए, अपनी प्रजनन सफलता को अधिकतम करने के लिए, पुरुषों ने अक्सर महिलाओं और उनकी कामुकता को नियंत्रित करने की कोशिश की है। खानाबदोश समाजों में जहां बहुत कम या कोई भौतिक धन नहीं है, जैसा कि अधिकांश शिकारी संग्रहकर्ताओं के मामले में था, एक महिला को साथ रहने के लिए आसानी से मजबूर नहीं किया जा सकता था। महिला और उसका साथी अपने रिश्तेदारों या अन्य लोगों के साथ रह सकते थे और न रहना चाहें तो उनसे अलग रह सकते थे।

अगर महिला के बच्चे हों तो उसके लिए अलग रहना मुश्किल होता है क्योंकि पिता की देखभाल बच्चों के विकास और यहां तक ​​​​कि जीवित रहने में मदद करती है, लेकिन महिला यदि चाहे तो कहीं और जा सकती थी और अपने रिश्तेदारों के साथ रह सकती थी या फिर अपने लिए कोई नया साथी तलाश कर सकती थी। कुछ क्षेत्रों में 12,000 साल पहले कृषि की उत्पत्ति ने खेल को बदल दिया। फसलों की हिफाजत करना जरूरी हो गया और एक जगह टिकना भी जरूरी हो गया। बस्तियां बसने लगीं और उसके साथ ही समूहों के भीतर और अन्तर समूह संघर्ष होने लगे। उदाहरण के लिए, वेनेजुएला में यानोमामो बागवानी विशेषज्ञ समूह किलेनुमा घरों में रहते थे और पड़ोसी समूहों पर हिंसक हमले करते थे और उनकी महिलाओं को उठाकर ले जाना जीवन का हिस्सा था।

जहां मवेशी-पालन विकसित हुआ, स्थानीय आबादी को अपने पशुओं को दूसरे समूहों से बचाना पड़ा, जिससे उच्च स्तर का युद्ध हुआ। चूंकि महिलाएं युद्ध में पुरुषों की तरह सफल नहीं थीं, शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण, यह भूमिका पुरुषों ने संभाली, जिससे उन्हें सत्ता हासिल करने में मदद मिली और उन्हें उन संसाधनों का प्रभारी बना दिया गया, जिनका वे बचाव कर रहे थे। जैसे-जैसे जनसंख्या का आकार बढ़ता गया और बसता गया, समन्वय की समस्याएं उत्पन्न हुईं। सामाजिक असमानता कभी-कभी उभरने लगी। संसाधनों पर कब्जा करने वाले ताकतवर लोगों (आमतौर पर पुरुष) ने आबादी को कुछ लाभ देकर अपनी तरफ मिला लिया और सामान्य आबादी, पुरुष और महिला अक्सर इन कुलीनों को सिर्फ इसलिए बर्दाश्त करने लगे ताकि उनके पास जो कुछ भी था, वह उनसे छीन न लें।

जैसे-जैसे खेती और पशुपालन अधिक गहन होता गया, भौतिक संपदा, जो अब मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा नियंत्रित होती थी और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। धन को लेकर परिवारों के बीच संघर्ष को रोकने के लिए नातेदारी और वंश व्यवस्था के नियम अधिक औपचारिक हो गए और विवाह अधिक संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) हो गए। पीढ़ियों से भूमि या पशुधन के संचरण ने कुछ परिवारों को अधिक धनवान बना दिया है।

मोनोगैमी बनाम बहुविवाह

खेती और पशुपालन से उत्पन्न धन ने बहुपत्नी प्रथा (एकाधिक पत्नियों वाले पुरुष) को जन्म दिया। इसके विपरीत, कई पति (बहुपतित्व) वाली महिलाएं दुर्लभ थीं। अधिकांश प्रणालियों में, लड़कियों को पैदा करना अधिक महत्व रखता था, क्योंकि उनके पास बच्चे पैदा करने की क्षमता थी और आमतौर पर वह माता-पिता की देखभाल अधिक अच्छी तरह करती थीं।  पुरुषों ने अपने धन का उपयोग युवा महिलाओं को संसाधनों का लालच देकर आकर्षित करने के लिए किया। पुरुषों ने दुल्हन के परिवार को धन देकर उन्हें अपनी पत्नी बनाया, जिसके परिणामस्वरूप अमीर पुरुष कई पत्नियां रख पाए, जबकि गरीब पुरुष अकेले हो गए। 

तो यह पुरुष थे, जिन्हें मैरिज पार्टनर के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए उस धन की आवश्यकता थी (जबकि महिलाओं ने अपने पति के माध्यम से प्रजनन के लिए आवश्यक संसाधनों का अधिग्रहण किया)। अगर माता-पिता अपने पोते-पोतियों की संख्या को अधिकतम करना चाहते थे, तो उनके लिए यह समझदारी थी कि वे अपनी संपत्ति अपनी बेटियों के बजाय अपने बेटों को दें। इससे धन और संपत्ति पर औपचारिक रूप से पुरुषों का अधिकार होने लगा। इसका मतलब यह भी था कि शादी के बाद महिलाएं अक्सर अपने घर से दूर अपने पति के परिवार के साथ रहने लगीं।

ऐसे में महिलाओं की शक्तियां कम होने लगीं। अगर भूमि, पशुधन और बच्चे पुरुषों की संपत्ति हैं, तो महिलाओं के लिए तलाक लगभग असंभव था। मां बाप के पास लौटने वाली एक बेटी अवांछित होती थी क्योंकि ऐसा होने पर उसके बदले में उसके माता पिता को दी गई रकम वापस लौटानी पड़ती थी। कुल मिलाकर पितृसत्ता अब मजबूत होती जा रही थी। अनिवार्य रूप से, महिलाएं अपने खिलाफ लैंगिक पूर्वाग्रह को झेल रही थीं। मोनोगैमी के अन्य परिणाम भी थे। चूंकि धन अभी भी एक पत्नी के बच्चों को मिलता था, पुरुषों ने यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया कि वे बच्चे उनके ही हों। वे अनजाने में अपने धन को किसी अन्य व्यक्ति की संतान के पास जाते हुए नहीं देखना चाहते थे। नतीजतन, महिलाओं की कामुकता पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए।

महिलाओं को अन्य पुरुषों से दूर रखना या उन्हें भारत में मठों जैसे धार्मिक केंद्रों में रखना, या चीन में महिलाओं के पैरों को छोटा रखने के लिए 2,000 साल बांधना, यह सब इसके परिणाम हो सकते हैं। और वर्तमान संदर्भ में, गर्भपात पर प्रतिबंध यौन संबंधों को संभावित रूप से मुश्किल बनाता है, लोगों को विवाह के नाम पर फंसाता है और महिलाओं के करियर की संभावनाओं में बाधा डालता है।

मातृसत्तात्मक समाज

धन का स्त्री के पक्ष में प्रवाहित होना अपेक्षाकृत दुर्लभ था, लेकिन ऐसे समाज मौजूद थे। ये महिला-केंद्रित प्रणालियां कुछ हद तक सीमांत वातावरण में होती थीं। जहां शारीरिक रूप से प्रतिस्पर्धा करने के लिए बहुत कम धन होता था। उदाहरण के लिए, अफ्रीका में ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें ‘मातृवंशीय बेल्ट’ के रूप में जाना जाता है, जहां कई कारणों से मवेशियों को रखना असंभव होता है। अफ्रीका में इनमें से कुछ मातृवंशीय प्रणालियों में सामान्य तौर पर, महिलाओं के पास अधिक शक्ति होती है। लंबे समय तक पुरुषों की अनुपस्थिति वाले समाज, जिनमें लंबी दूरी की यात्रा या उच्च मृत्यु दर के जोखिम के कारण पुरूषों की संख्या नगण्य हो गई, उदाहरण के लिए पोलिनेशिया में खतरनाक समुद्र में मछली पकड़ने के कारण या कुछ मूल अमेरिकी समुदायों में युद्ध के कारण, जिससे मातृसत्ता को बढ़ावा मिला।

मातृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाएं बच्चों की परवरिश में मदद करने के लिए अक्सर अपने पति के बजाय अपनी मां और भाई-बहनों का सहारा लेती हैं। महिलाओं द्वारा इस तरह के ‘सामुदायिक प्रजनन’, जैसा कि चीन में कुछ मातृवंशीय समूहों में देखा जाता है, पुरुषों को घर में निवेश करने में कम दिलचस्पी (एक विकासवादी अर्थ में) होती है, क्योंकि परिवारों में न केवल उनकी पत्नी के बच्चे शामिल होते हैं, बल्कि कई अन्य महिलाओं के बच्चे भी शामिल होते हैं। जिनसे वे संबंधित नहीं हैं। यह शादी के बंधन को कमजोर करता है और महिला रिश्तेदारों के बीच धन के हस्तांतरण को आसान बनाता है। ऐसे समाजों में महिलाओं को यौन रूप से कम नियंत्रित किया जाता है। महिलाएं धन को नियंत्रित करती हैं और अपनी बेटियों को देती हैं।

मातृवंशीय समाजों में, पुरुष और महिला दोनों बहुविवाह कर सकते हैं। दक्षिणी अफ्रीका के मातृवंशीय हिम्बा में इस तरह से पैदा होने वाले शिशुओं की दर सबसे अधिक है। आज भी शहरी परिवेश में, उच्च पुरुष बेरोजगारी अक्सर अधिक महिला केंद्रित रहने की व्यवस्था स्थापित करती है, जिसमें माताएं बेटियों को अपने बच्चों और पोते-पोतियों को पालने में मदद करती हैं, लेकिन अक्सर सापेक्ष गरीबी में। लेकिन भौतिक धन की शुरूआत, जिसे पुरुषों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, ने अक्सर मातृवंशीय व्यवस्थाओं को पितृवंशीय व्यवस्था में बदलने के लिए प्रेरित किया है।

जैसे-जैसे पुरुष और महिला दोनों तेजी से अपनी संपत्ति अर्जित करते हैं, पुरानी पितृसत्ता के लिए महिलाओं को नियंत्रित करना कठिन होता जा रहा है। अगर लड़कियों को औपचारिक शिक्षा से समान रूप से लाभ मिलता है और नौकरी के अवसर सभी के लिए खुले हैं, तो माता-पिता द्वारा पुरुष पक्षपाती निवेश का तर्क मान्य नहीं रह जाता है। पितृसत्ता बहुत आवश्यक नहीं है। हमें दुनिया की समस्याओं को हल करने में मदद करने के लिए संस्थानों की जरूरत है। लेकिन अगर गलत लोग सत्ता में आते हैं, तो पितृसत्ता फिर से पैदा हो सकती है।

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